History

हनुमान जी का इतिहास

हनुमान जी का इतिहास, हनुमान जी का जन्म, बजरंगबली क्यों कहा जाता है, हनुमान जी के पांच भाई , हनुमान जी की सत्य घटना

हनुमान जी का इतिहास 

देवराज इंद्र के लोक में एक अप्सरा कुंजीस्थली रहती थी जब एक बार दुर्वासा ऋषि इंद्र की सभा में उपस्थित थे जब अप्सरा बार-बार अंदर बाहर आकर सभा में विघ्न उत्पन्न कर रही थी जिससे दुर्वासा ऋषि क्रोधित हो गए और उन्होंने उस अप्सरा को बंदरिया हो जाने का श्राप दे दिया इसके बाद अप्सरा ने ऋषि से श्राप वापस लेने के लिए बहुत प्रार्थना की तब दुर्वासा ऋषि ने उन्हें इच्छा अनुसार रूप धारण करने का वरदान दिया कुछ वर्षों बाद अप्सरा कुंजीस्थली ने वानर श्रेष्ठ ब्रज के यहां वानरी रूप में जन्म लिया और उनका नाम अंजनी रखा गया

विवाह योग्य होने पर उनके पिता ने अपनी पुत्री अंजनी का विवाह महान पराक्रमी, शिरोमणि वानरराज केसरी से कर दिया बहुत समय तक जब अंजनी मां को संतान नहीं हुई तब उन्होंने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए कठिन तप किया फिर एक बार वानर राज केसरी प्रभास तीर्थ के निकट थे तब उन्होंने देखा की वहां बहुत से साधु ध्यान लगाकर पूजा अर्चना कर रहे हैं तभी एक विशाल हाथी आया और उसने वहां बैठे ऋषियों को मारना प्रारंभ कर दिया

वहीं ऋषि भरद्वाज अपने आसन पर ध्यान लगाकर बैठे थे वह हाथी उनकी ओर बढ़ रहा था तभी वानर राज केसरी ने बलपूर्वक हाथी के दांतो को पकड़कर उसे मार डाला तब सभी ऋषियों ने प्रसन्न होकर राजा केसरी को वरदान मांगने को कहा,तब उन्होंने इच्छा अनुसार रूप धारण करने वाला पवन के समान तेज तथा रूद्र के समान पुत्र प्राप्त करने का वरदान मांगा था इसके बाद सभी ऋषि उन्हें यह वरदान देकर वहां से चले गए | हनुमान जी का इतिहास |

हनुमान जी का जन्म 

 एक दिन अंजनी माता पर्वत के शिखर पर खड़े होकर सूर्य की किरणों को निहार रही थी तभी तेज हवा के झोंके से उनका वस्त्र थोड़ा सा उड़ गया जब उन्होंने चारों तरफ देखा तो सभी वृक्षों के पत्ते शांत थे तब उन्होंने सोचा यह अवश्य कोई राक्षस होगा तब क्रोधित होकर बोली दुष्ट छिपकर मुझ स्त्री का अपमान करने की चेष्टा करते हो तभी अचानक वहां पवन देव प्रकट हो गए और बोले देवी मुझे क्षमा करें आपके पति को ऋषियों ने मेरे सामान पराक्रम पुत्र होने का वरदान दिया है

ऋषियों के वचन और भगवान शिव की आज्ञा से मैंने आपको स्पर्श किया जिससे आप एक महान तेजस्वी पुत्र को जन्म दोगी उन्होंने कहा भगवान शिव के अंश रूद्र मेरे स्पर्श से आपके गर्भ में प्रविष्ट हुए हैं और वही आपके पुत्र के रूप में जन्म लेंगे इसके बाद शास्त्रों की गणना के अनुसार हनुमान जी का जन्म आज से 58112 वर्ष पहले त्रेता युग में “चैत्र पूर्णिमा मंगलवार” के दिन चित्रा नक्षत्र व मेष लग्न के आयोग में सुबह 6:30 पर भारत देश के “झारखंड” राज्य के गुमला जिले में हुआ था | हनुमान जी का इतिहास |

बजरंगबली क्यों कहा जाता है 

हनुमान जी भगवान शिव के 11वें रुद्र अवतार है जो सबसे बलशाली और बुद्धिमान है हनुमान जी का जन्म श्री राम और श्री राम भक्तों की सहायता करने के लिए हुआ है इस संपूर्ण कलयुग में हनुमान जी उपस्थित रहकर श्री राम भक्तों की सहायता अवश्य करते हैं जो सच्चे मन, कर्म, और वचन से श्री राम जी का भक्त हैं स्वयं हनुमान जी की कृपा उस पर हमेशा बनी रहती है इस पृथ्वी पर जिन 7 ऋषियों को अमरत्व का वरदान प्राप्त है उनमें हनुमान जी भी शामिल है हनुमान जी के पराक्रम की अनेक कथाएं रामायण एवं अन्य ग्रंथों में प्रचलित है इनका शरीर वज्र के समान होने के कारण इन्हें “बजरंगबली” और पवन के समान वेग होने के कारण इन्हें “मारुति” कहा जाता है

बचपन में मां अंजनी और पिता केसरी ने इनका नाम मारुति रखा था लेकिन जब सूर्य को निगल लेने पर इंद्र ने मारुति पर वज्र प्रहार किया तब मारुति की टोडी का रूप बिगड़ गया जब से इनका नाम हनुमान पड़ गया हनुमान का अर्थ होता है बिगड़ी हुई टोंडी हनुमान जी के 108 और नाम है और हर नाम का अलग-अलग अर्थ है इन के 108 नामों का जप करने से समस्त दुख रोगों का नाश हो जाता है कहते हैं कि हनुमान जी आज भी अयोध्या में श्री राम नवमी पर सरयू नदी के किनारे साधु का वेश धारण कर ब्राह्मणों को भोजन कराने आते हैं | हनुमान जी का इतिहास |

हनुमान जी के पांच भाई 

एक बार हनुमान जी ने श्रीराम की याद में अपने पूरे शरीर पर सिंदूर लगा लिया था क्योंकि उन्होंने 1 दिन माता सीता को सिंदूर लगाते हुए देख लिया था जब उन्होंने माता सीता से इसका कारण पूछा तो माता सीता ने कहा यह सिंदूर श्री राम के प्रति प्रेम और सम्मान का प्रतीक है यह जानने के बाद हनुमान जी ने अपने पूरे शरीर पर सिंदूर लगा लिया यह दर्शाने के लिए कि वह भी श्री राम से बहुत प्रेम करते हैं इस घटना के बाद हनुमान जी का लाल रंग में उनका रूप बहुत ही प्रचलित हुआ

महाभारत काल में भीम अपने बल के कारण जाने जाते थे वह भी हनुमान जी के भाई थे  इनके अलावा हनुमान जी के पांच भाई और भी थे हनुमान जी के पांच सगे भाई और भी थे और वह सभी विवाहित थे इस बात का उल्लेख ब्रह्मांड पुराण में मिलता है पांचों भाइयों में बजरंगबली सबसे बड़े थे हनुमान जी को शामिल करने के बाद वानर राज केसरी के 6 पुत्र थे सभी में सबसे बड़े बजरंगबली थे इनके बाद मति मान, श्रुति मान ,केतु मान, गतिमान धूती मान थे इन सभी की संताने भी थी जिसके कारण इनका वंश कई वर्षों तक चला था | हनुमान जी का इतिहास |

हनुमान जी की सत्य घटना 

जब बाली को यह वरदान मिला कि जो भी उस से युद्ध करने उसके सामने आएगा तो उसकी आदि शक्ति वाली में चली जाएगी और बाली हर युद्ध में जीत जाएगा सुग्रीव और बाली दोनों ब्रह्मा के औरस पुत्र थे बाली पर ब्रह्मा जी की सदैव कृपा बनी रहती थी बाली को अपनी शक्ति पर बहुत ही घमंड था उसका घमंड और भी अधिक बढ़ गया जब उसने तीनों लोकों के सबसे शक्तिशाली योद्धा रावण से युद्ध किया था बाली ने रावण को अपनी पूंछ से बांधकर पूरी दुनिया में भ्रमण किया था रावण जैसे योद्धा को हराकर बाली के घमंड की कोई सीमा नहीं रही थी इसके बाद बाली अपने आपको संसार का सबसे बड़ा योद्धा समझने लगा था

1 दिन बाली अपने घमंड में हरे भरे पौधों को तिनके के समान उखाड़ कर फेंक रहा था बाली अपनी ताकत के नशे में पूरे जंगल को उजाड़ रहा था और वह बार-बार युद्ध करने की चेतावनी दे रहा था उसी जंगल में हनुमान जी राम का जाप कर रहे थे बाली की इस हरकत के कारण हनुमान जी की तपस्या में विघ्न उत्पन्न हो रहा था इसके बाद हनुमान जी वाली के पास आए और उन्हें समझाने लगे हनुमान जी ने बाली को राम नाम का जाप करने के लिए कहा और कहा कि राम का जाप करने से लोक और परलोक दोनों ही सुधर जाएंगे इसके बाद बाली ने हनुमान जी को बहुत ही अपमानित किया और कहा कि मेरे से बड़ा इस दुनिया में कोई भी नहीं है इसके बाद हनुमान जी ने कहा कि राम तीनों लोकों का स्वामी है जब बाली ने राम जी के प्रति कटु वचन कहे तब हनुमान जी को बहुत ही क्रोध आया और हनुमान ने बाली को युद्ध करने के लिए कहा तब बाली ने कहा कि कल हम नगर के बीचो बीच युद्ध करेंगे और हनुमान जी ने यह चेतावनी स्वीकार कर ली थी

अगले दिन जब हनुमान जी युद्ध के लिए जा रहे थे तब उन्हें रास्ते में ब्रह्मा जी ने रोक लिया और हनुमान जी ने ब्रह्मा जी को प्रणाम किया इसके बाद ब्रह्मा जी ने हनुमान जी से निवेदन किया कि तुम मेरे पुत्र बाली से युद्ध करने के लिए मत जाओ इसके बाद हनुमान जी ने कहा बाली ने मेरे आराध्य राम जी के बारे में बहुत ही कटु वचन बोले हैं इसलिए मैं उसे क्षमा नहीं कर सकता हनुमान जी ने कहा बाली ने मुझे युद्ध की चुनौती दी है यदि मैं युद्ध करने के लिए नहीं गया तो पूरा ब्रह्मांड मुझे कायर कहेगा इसके बाद ब्रह्मा जी ने कहा आप अपने समस्त शक्तियों को अपने साथ लेकर ना जाए केवल दसवां भाग ही अपने साथ लेकर जाएं, बाकी शक्तियों को अपने आराध्य के चरणों में रख दो युद्ध से आने के बाद उन्हें फिर से ग्रहण कर लेना इसके बाद हनुमान जी ने ब्रह्माजी की बात को मान लिया था

जब हनुमान जी वहां पहुंचे तो बाली ने पूरे नगर को अखाड़े के रूप में बदल दिया था और वहां पर इन दो महान योद्धाओं का युद्ध देखने के लिए बहुत ही भीड़ लगी हुई थी जब हनुमान जी ने अपना एक पैर अखाड़े में रखा तब उनकी आधी शक्ति बाली में चली गई इसके बाद जैसे ही बाली के शरीर में शक्ति आई तो उनके शरीर में बदलाव आने लगे बाली का शरीर बल के प्रभाव में फूलने लगा था उनके शरीर का फट कर खून निकलने लगा था बाली को उस समय कुछ भी समझ नहीं आ रहा था तभी ब्रह्मा जी बाली के पास प्रकट हुए और उन्होंने कहा कि पुत्र यदि तुम अपनी जान बचाना चाहते हो तो यहां से बहुत दूर चले जाओ इसके बाद बाली दौड़ने लगा 100 फीट तक दौड़ने के बाद वह थक कर गिर गया जब उसे होश आया तब उसने अपने सामने ब्रह्मा जी को देखा और पूछा कि यह सब क्या था

हनुमान से युद्ध करने से पहले मेरा शरीर फटने क्यों लगा तो ब्रह्मा जी ने कहा पुत्र जब हनुमान जी तुम्हारे सामने आए तब उनका आधा बल तुम्हारे में समा गया था तब ब्रह्माजी ने पूछा उस समय तुम्हें कैसा लगा तब बाली ने कहा मुझे ऐसा लगा जैसे सागर की लहरें मेरे अंदर समा रही हो तब ब्रह्मा जी ने बाली को पूरी बात बताई और कहा कि मैंने हनुमान को दसवां हिस्सा अपने साथ लाने के लिए कहा था तुम उन के दसवें हिस्से में से आधा भी नहीं संभाल पाए यदि वह अपने साथ सारी शक्तियां लेकर आते, तो तुम्हारे शरीर का क्या होता इतना सुनने के बाद बाली हैरान रह गया और पूछा कि पिताजी हनुमान के पास यदि इतनी शक्तियां है तो वह कहां प्रयोग करेंगे तब ब्रह्मा जी ने कहा कि हनुमान जी अपने पूरे बल का प्रयोग कहीं भी नहीं कर पाएंगे क्योंकि उनके बल का दसवां भाग भी पूरी सृष्टि नहीं सहन कर पाती है इसके बाद बाली ने हनुमान जी को दंडवत प्रणाम किया और माफी मांगी थी इसके बाद बाली ने आत्म ज्ञान से भरकर राम नाम का तप किया और राम से ही मोक्ष का मार्ग प्राप्त किया था 

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