History

जयप्रकाश नारायण का जीवन परिचय

जयप्रकाश नारायण का जीवन परिचय, जयप्रकाश नारायण का जन्म, जयप्रकाश नारायण का सर्वोदय संबंधी विचार, जयप्रकाश नारायण की मृत्यु , जयप्रकाश नारायण का राजनैतिक जीवन

जयप्रकाश नारायण का जीवन परिचय 

भारतीय समाजवादी विचारको में जयप्रकाश नारायण का नाम प्रमुखता से लिया जाता है लोकनायक जयप्रकाश नारायण एक राजनीतिक दार्शनिक की अपेक्षा एक सामाजिक दार्शनिक अधिक थे उन्होंने जीवन भर साधारण जनता के कल्याण के लिए अपना संघर्ष किया उन्होंने राजनीतिक भ्रष्टाचार को सभी सामाजिक समस्याओं की जड़ माना और समय-समय पर राजनीति में सुधारो के बारे में अपने मूल्यवान सुझाव दिए ताकि राजनीति में नैतिक साधनों का उचित प्रयोग किया जा सके उन्होंनेव्यवहारिक समस्याओं के अनुरूप हीराजनीतिक विचारों का प्रतिपादन करकेभारतीय राजनीतिक चिंतन  के इतिहास में अपना अमूल्य योगदान दिया | जयप्रकाश नारायण का जीवन परिचय |

जयप्रकाश नारायण का जन्म 

जयप्रकाश नारायण का जन्म 11 अक्टूबर 1902 को सिताब दियारा गांव में हुआ यह गांव उत्तर प्रदेश तथा बिहार के सीमांत पर था इनके पिताजी का नाम “श्री हरसू दयाल’ और इनकी माता जी का नाम “फूलरानी” था इनकी पत्नी का नाम प्रभावती देवी था जो गांधीवादी ब्रजकिशोर प्रसाद की पुत्री थी बचपन में जयप्रकाश बाउल नाम से जाने जाते थे पर बाद में जयप्रकाश नारायण के नाम से प्रसिद्ध हुए  और भारत ने उन्हें जे.पी. नाम दिया उनकी सामाजिक चेतना ने उन्हें ‘लोकनायक’ नाम से अलंकृत किया उनकी प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही संपन्न हुई इसके बाद आगे की शिक्षा उन्होंने पटना में पूरी की जयप्रकाश नारायण अपनी अधूरी शिक्षा छोड़कर “असहयोग आंदोलन” में कूद पड़े थे1922 में शिक्षा प्राप्ति के लिए अमेरिका गए

वहां के कैलिफोर्निया मेडिसन आदि कई विश्वविद्यालय में अध्ययन किया मार्क्सवाद और समाजवाद की शिक्षा यहां ग्रहण की मां की अस्वस्थ के कारण उनकी शिक्षा P.H.D. तक पहुंची किंतु पूरी ना हो सकी जयप्रकाश नारायण का विचार था कि उद्योगों के राष्ट्रीयकरण मात्र से ही समाजवाद की स्थापना संभव नहीं है, इससे नौकरशाही के हाथ मजबूत होते हैं तथा केंद्रीय करण की प्रवृत्ति बढ़ती है इसी तरह बड़े स्तर के उद्योगों की आर्थिक विषमता को बढ़ावा देते हैं कम नहीं करते इसलिए उन्होंने विकेंद्रीकरण का सुझाव दिया और छोटे छोटे उद्योगों की आर्थिक विषमता दूर करने में सहायक बताया

उन्होंने कृषि के क्षेत्र में समाजवाद का अर्थ स्पष्ट करते हुए बताया कि भूमि का स्वामित्व जोतने वालों के हाथ में हो जमीदारी प्रथा को समाप्त किया जाए और सहकारी कृषि को बढ़ावा दिया जाए इसके अतिरिक्त सहकारी ऋण तथा बाजार व्यवस्था आदि के माध्यम से किसानों को साहूकारों व व्यापारियों के शोषण से मुक्त किया जाए इस तरह उन्होंने कृषि तथा उद्योगों दोनों में ही उत्पादन के साधनों के विकेंद्रीकरण पर जोर दिया उन्होंने कृषि उद्योगों के समाजीकरण के लिए नैतिक व लोकतांत्रिक साधनों का सुझाव दिया उनका मानना है कि समाजवाद जैसे आदर्श की स्थापना उचित साधनों के द्वारा ही होनी चाहिए जयप्रकाश नारायण ने अपनी पुस्तक में लिखा है कोई भी दल समाजवाद की स्थापना तब तक नहीं कर सकता

जब तक वह राज्य की शक्ति अपने हाथ में ना ले ले चाहे वह जनता के समर्थन से प्राप्त करें या सरकार गिरा कर उन्होंने विश्वास व्यक्त किया है कि जब किसान ,दलित, गरीब, सभी कमजोर वर्ग में वर्ग- चेतना का उदय होगा तो समाजवाद की स्थापना हो जाएगी उन्होंने यह भी कहा है कि वर्ग चेतना के साथ-साथ व्यक्ति को अपनी भौतिक आवश्यकताओं पर भी नियंत्रण करना होगा इसके बिना समाजवादी समाज की स्थापना संभव नहीं है उन्होंने कहा कि समाजवाद भारतीय संस्कृति का विरोधी नहीं है यह उसके अनुरूप ही है मार्क्स का समाजवाद भारतीय संस्कृति के ही मूल आदर्श जैसे मिलजुलकर बांटना, वह उपभोग करना, निम्न कोटि की वासनाओं तथा परिग्रह की वृत्ति  से मुक्ति के अनुरूप ही विकसित हुआ है इसलिए समाजवाद भारतीय संस्कृति को विरोधी नहीं बल्कि इसका अनुरूप ही है | जयप्रकाश नारायण का जीवन परिचय |

जयप्रकाश नारायण का सर्वोदय संबंधी विचार

 जयप्रकाश नारायण महात्मा गांधी और दिनों की तरह सर्वोदय परम लक्ष्य में विश्वास करते थे सर्वोदय से उनका अभिप्राय सभी लोगों के जीवन सत्र में सुधार करना और सभी क्षेत्रों में कल्याण करना महात्मा गांधी और विनोवा के सर्वोदय से संबंधित विचारों को स्वीकार करते हुए जयप्रकाश नारायण ने भी सबके कल्याण पर बल दिया वह समाज के हर वर्ग का जीवन स्तर अच्छा बनाना चाहते थे

वह भारतीय समाज में समग्र क्रांति लाना  चाहते थे ताकि भारतीय समाज का आर्थिक सामाजिक राजनीतिक विकास हो सके जयप्रकाश नारायण ने कहा था सर्वोदय योजना कोई भावुकता प्रधान योजना ना होकर सामाजिक क्रांति का एक सुझाव है उन्होंने लिखा है यदि हमें हीतो में विरोध प्रतीत होता है तो इसका कारण धारणा है और हमारा गलत आचरण है यदि हम मानव हितों की एकता में विश्वास पैदा करें तो हम सर्वोदय की वास्तविकता के अधिक निकट पहुंच सकेंगे सर्वोदय में यह मान्यता निहित है कि मानव आत्मा पवित्र है और स्वतंत्रता न्याय तथा बंधुत्व दर्शकों को हमें अधिक महत्व देना चाहिए

सर्वोदय एक जीवन व्यापी क्रांति है व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन के सभी पहलुओं में अमूल क्रांति लाना सर्वोदय का अंतिम लक्ष्य है जयप्रकाश नारायण का मानना था कि शांतिपूर्ण व नैतिक साधनों द्वारा देश में सामाजिक व आर्थिक क्रांति लाई जा सकती है इसलिए उन्होंने लोगों को भू-दान, ग्रामदान और संपत्ति दान के लिए प्रेरित किया उन्होंने सर्वोदय समाज में दलीय राजनीति को कोई महत्व नहीं दिया सर्वोदय आंदोलन की सफलता के लिए उन्होंने नैतिक साधनों पर जोर दिया उनका कहना था कि सर्वोदय समाज में मैं केवल नए व समानता के अवसर प्राप्त होंगे बल्कि जनतंत्र व्यवस्था भी होगी जो व्यक्ति की स्वतंत्रता पर आधारित होगी और व्यक्ति अपनी शासन व्यवस्था का खुद निर्माण करेगा यह व्यवस्था विकेंद्रीकृत होगी जिसमें ज्यादा सत्ता व संसाधन ग्राम सभा के पास होंगे | जयप्रकाश नारायण का जीवन परिचय |

जयप्रकाश नारायण का राजनैतिक जीवन

 1929 में जयप्रकाश नारायण कांग्रेस में सम्मिलित हुए और 1932 के ‘सविनय अवज्ञा’ आंदोलन में जेल गए वापिस आकर कांग्रेस के अंदर ही ‘कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी’ का गठन किया, फिर जेल यात्रा हुई तथा 1942 के आंदोलन में उन्हें प्रतिष्ठा के शिखर पर आरूढ़ कर दिया गया जयप्रकाश नारायण विनोवा जी के सर्वोदय आंदोलन से भी जुड़े थे छात्र आंदोलन का भी उन्होंने नेतृत्व किया था आपातकाल में जेल भेज दिए गए उनके मार्गदर्शन में ही जनता पार्टी का जन्म हुआ

जयप्रकाश नारायण ने कुछ कविताएं भी लिखी है डायरी एवं निबंध  की भी रचना की है जैसे कि ‘ऑफ इंडियन पॉलिटी’जयप्रकाश नारायण को 1965 में समाजसेवार्थ मैग्सेसे सम्मान प्राप्त हुआ 1998 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया जयप्रकाश जी 20 वीं सदी में भारत के 1 प्रमुख समाजवादी विचारक, क्रांति दल के नेता, समर्पित राष्ट्रभक्त तथा विद्रोही स्वाधीनता सेनानी भी थे जयप्रकाश एक विद्वान व्यक्ति थे और उनका अध्ययन विशाल था उनको उस समय के कतिपय प्रमुख नेताओं में स्थान दिया जाता था स्वाधीनता प्राप्ति के बाद उन्होंने सत्ता केंद्रित राजनीति की ओर न जाकर लोक केंद्रित रचनात्मक राजनीति और समाज सेवा का मार्ग चुना 

जयप्रकाश नारायण का राष्ट्रवाद संबंधी विचार 

लोकनायक जयप्रकाश नारायण सच्चे देशभक्त थे उन्होंने भारत की पराधीनता को दूर करने की बहुत अधिक चिंता थी उन्होंने अपनी रचनाओं में राष्ट्रवाद के महत्व को प्रतिपादित किया है उन्होंने लिखा है कि राजनीतिक स्वतंत्रता के बिना सामाजिक व आर्थिक कल्याण की योजनाओं का कोई महत्व नहीं है वह एक राष्ट्रवादी क्रांतिकारी थे और कई बार जेल भी गये उन्होंने राष्ट्रवाद के महत्व के बारे में कहा है कि जब तक प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में राष्ट्रवाद की भावना का विकास नहीं होगा

तब तक देश का सर्वांगीण विकास नहीं हो सकता उन्होंने कहा भारत में सांस्कृतिक एकता होते हुए भी राजनीतिक एकता का अभाव है भारत में ब्रिटिश शासन द्वारा संपूर्ण भारतीय प्रदेश पर अधिकार करने के बाद ही एक सरकार के अंतर्गत राष्ट्रीय एकता का उदय हुआ है लेकिन यह राजनीतिक एकता ऊपर से थोपी हुई है इसके द्वारा राष्ट्रवाद की स्थापना नहीं हो सकती ब्रिटिश शासन के खिलाफ जब तक सारी जनता एकजुट नहीं होगी तब तक राष्ट्रीयता का विकास नहीं हो सकता उन्होंने राष्ट्रीय एकता के लिए धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण अपनाने का सुझाव दिया है

उन्होंने कहा है राष्ट्रीय एकता के लिए यह आवश्यक है कि उन्होंने कहा है- राष्ट्रीय एकता के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति धार्मिक अंधविश्वासों से बाहर निकल कर अपने अंदर एक बौद्धिक वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करें इस तरह जयप्रकाश नारायण की राष्ट्रवाद की अवधारणा संग किरण ना होकर एक व्यापक धारणा है उनका राष्ट्रवाद समस्त मानव जाति के कल्याण के लिए है | जयप्रकाश नारायण का जीवन परिचय |

आधुनिक लोकतंत्र की अवधारणा 

जयप्रकाश नारायण का मानना था कि आधुनिक युग संसदीय लोकतंत्र का युग है इस लोकतंत्र में संविधान दलों और चुनाव का महत्व है लेकिन यह बातें तब तक अर्थहीन है जब तक जनता में नैतिक मूल्य और आध्यात्मिक गुणों का विकास ना हो जाए इसलिए उन्होंने लोकतंत्र को दलीय  लोकतंत्र बनाने पर जोर दिया

उन्होंने लोकतंत्र की चुनाव प्रणाली को अस्वीकार किया उनका मानना है कि हर चुनाव क्षेत्र में उम्मीदवारों की संख्या अधिक होने पर मतों का बंटवारा हो जाता है साधारण बहुमत वाला उम्मीदवार भी विजेता घोषित कर दिया जाता है गलत मत के आधार पर बनी सरकार कभी भी लोकतांत्रिक सरकार नहीं बन सकती इस तरह संसदीय लोकतंत्र का आधार संकुचित होता है इसी तरह संसदीय लोकतंत्र में दलों की भूमिका भी नकारात्मक होती है 

 जयप्रकाश नारायण की मृत्यु 

जयप्रकाश नारायण ने समता, न्याय, सामाजिक परिवर्तन और लोकतंत्र के पक्ष में पत्रकारिता को बढ़ावा दिया था साथ ही लोक सेवा के कई कार्यक्रम अभियान भी चलाए 8 अक्टूबर 1979 को पटना में उनका देहांत हो गया | जयप्रकाश नारायण का जीवन परिचय |

 

Back to top button