History

लोक संत जसनाथ जी का इतिहास

लोक संत जसनाथ जी का इतिहास, संत जसनाथ जी का जन्म, संत जसनाथ जी के चमत्कार, संत जसनाथ जी के गुरु, संत जसनाथ जी की मृत्यु, संत जसनाथ जी के पांच उपपीठ

संत जसनाथ जी का जन्म 

जसनाथ जी का जन्म 1482 में राजस्थान के बीकानेर जिले के “कतरियासर” मे हुआ था इनके पिता जी का नाम ‘हमीर जाट’ और इनकी माता जी का नाम ‘रूपादे’ था इनके बचपन का नाम जसवंत था परंतु बाद में इनके गुरु गोरखनाथ ने इनका नाम जसनाथ रख दिया था एक बार इनके पिता हमीर जी सोए हुए थे तब उन्हें स्वप्न में दिखाई दिया कि उनके घर से उत्तर दिशा की ओर एक तालाब है और उस तालाब पर एक नन्हा सा बच्चा बैठा हुआ है

जब उनकी आंखें खुली तो वह उस आए हुए स्वपन को याद किया और अपने घर से उत्तर दिशा की ओर चल दिए और वह उसी तालाब के पास पहुंच गए जब वह तालाब के पास पहुंचे तो वहां पर सच में एक बच्चा बैठा हुआ था जो कि आगे संत जसनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ हमीर जी और रूपादे के कोई भी संतान नहीं थी इन्होंने ही जसनाथ जी का पालन पोषण किया था | लोक संत जसनाथ जी का इतिहास |

संत जसनाथ जी के चमत्कार

 जब जसनाथ जी 1 वर्ष के थे तब व खेलते हुए गर्म अंगारों पर बैठ गए तब इनकी माता रूपादे ने इन्हें तुरंत बाहर निकाला जब उन्होंने देखा कि उनके शरीर पर एक भी जलने का निशान नहीं था तो वह हैरान रह गई एक बार जब जसनाथ जी 2 वर्ष के थे तब उन्होंने अपनी माता से कहा कि मुझे बहुत ही जोर से भूख लगी है मुझे दूध पीना है तब इनकी माता ने कहा कि लोटे में जो दूध रखा है वह पी लो इसके बाद इन्होंने वहां पर जितना भी दूध था वह सारा दूध पी लिया

जब जसनाथ जी 5 वर्ष के हुए तब इनके पिता जी इन्हें शिक्षा के लिए एक विद्वान के पास ले गए तो उस विद्वान ने कहा कि अभी यह बहुत ही छोटा है कुछ बड़ा होने दीजिए उसके बाद ही हम इन्हें शिक्षा देंगे उनकी यह बात सुनकर जसनाथ ने 25 वर्ष के युवक का रूप धारण कर लिया और विद्वान का सम्मान करते हुए कहा कि आप विद्या का मुहूर्त मत टालिए और मुझे शिक्षा दीजिए बालक जसनाथ ने अल्पकाल में ही शास्त्रों का अध्ययन कर लिया था | लोक संत जसनाथ जी का इतिहास |

संत जसनाथ जी के गुरु 

संत जसनाथ जी निर्गुण भक्ति धारा के संत थे यह भगवान के मूर्ति रूप में विश्वास नहीं करते थे 1494 ईस्वी में इन्होंने गोरखनाथ जी से दीक्षा ग्रहण की थी संत जसनाथ जी के गुरु यशो नाथ पुराण के अनुसार  गुरु गोरखनाथ को माना जाता है जसनाथ जी के विचारों से प्रभावित होकर सिकंदर लोदी ने इन्हें 500 बीघा जमीन  बीकानेर के कतरियासर में उपलब्ध करवाई थी बीकानेर के “गोरख मालिया” में जसनाथ जी ने 12 वर्षों तक तपस्या की थी और उन्होंने 36 नियम बनाए थे इन्हीं 36 नियमों को पालन करने वाले अनुयायियों को ही जसनाथी कहा जाता है

इन्होंने1504 ईस्वी में ‘चूरू’ में जसनाथी संप्रदाय की स्थापना की थी जसनाथ जी द्वारा दिए गए कुछ नियम जांभोजी के नियमों से मिलते जुलते हैं इनका एक नियम यह था कि पानी छानकर पीना चाहिए, जीव हिंसा नहीं करनी चाहिए जसनाथ जी के कुछ अपने महत्वपूर्ण नियम थे जैसे कि ब्याज न लेना, धन का 20 वां हिस्सा दान करना, झूठे मुंह अग्नि में फूंक न देना आदि जसनाथ जी ने दो ग्रंथों की रचना की थी सिंभूदड़ा और कोंडा इन ग्रंथों में जसनाथ जी द्वारा दिए गए उपदेश हैं 

संत जसनाथ जी की मृत्यु 

जसनाथ जी ने 1506 में बीकानेर के कतरियासर गांव में जीवंत समाधि ली थी उस समय उनकी आयु केवल 24 वर्ष थी इनके समाधि लेने के बाद इनके शिष्य जोगाजी इनकी गद्दी पर बैठ गए थे कतरियासर गांव में साल में तीन बार मेला लगता है बीकानेर के कतरियासर गांव में अग्नि नृत्य किया जाता है इस नृत्य में अंगारों का ढेर लगाया जाता है और उसके चारों तरफ पानी की  लिक लगाई जाती है

इस नृत्य में केवल पुरुष ही भाग लेते हैं सबसे पहले वह अपने गुरु जसनाथ का आशीर्वाद लेते हैं और उसके बाद इस अंगारों के ढेर में प्रवेश कर जाते हैं यह नृत्य फाल्गुन और चैत्र मास में किया जाता है इस प्रकार यह नृत्य जसनाथी संप्रदाय के द्वारा किया जाता है इस नृत्य का सरंक्षण बीकानेर के गंगा सिंह महाराज ने किया था जसनाथ जी के जो अनुयाई हैं वह अपने गले में काले रंग का ऊनी धागा पहनते हैं | लोक संत जसनाथ जी का इतिहास |

संत जसनाथ जी के पांच उपपीठ 

जसनाथ जी के जो अनुयाई है वह जाल वृक्ष और मोर को बहुत ही पवित्र मानते हैं संत जसनाथ जी की पांच पीठ और भी है -पांचला (नागौर), पूर्णा सर,  मालासर, बमल, लिखमादेसर जसनाथी संप्रदाय में जो विरक्त संत होते हैं उन्हें परमहंस करते हैं 

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