History

माता पाथरी का इतिहास

माता पाथरी का इतिहास, माता पाथरी की उत्पत्ति , नत्थू की बलि, पथरी माता मंदिर, माता पाथरी वाली की साधना

माता पाथरी का इतिहास

माता पाथरी का स्थान हरियाणा के पानीपत जिले के सीख पाथरी गांव में है माता पाथरी को कई नामों से जाना जाता है माता पाथरी 52 रूपी है जो शक्ति 52 रूपी होती है उसकी शक्ति अथाह होती है वह शक्ति अपने भक्तों पर कृपा भी करती है और दुष्टों का संहार करती है माता पाथरी का नाम ‘धूतनी’ भी है

इनका यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि इनके गुरु नागे बाबा ने इन्हें धूणे से प्रकट किया था माता पाथरी के साथ पांच बावरी, माता शीतला, माता मसानी, माता काली जैसी अनेक शक्तियां चलती है

माता पाथरी अनेक बड़े कार्यों को करने में सक्षम है पाथरी माता बहुत सारे घरों की कुलदेवी भी है माता पाथरी पुत्र रतन देने में सबसे अधिक सक्षम है माता के दरबार में जो पुत्र प्राप्ति के लिए आते हैं माता पाथरी उन्हें पुत्र रतन जरूर देती है माता पाथरी के मंदिर में मन्नत के लिए कलावा बांधा जाता है जब वह मन्नत पूरी हो जाती है तो वह कलावा खोलने के लिए वापस माता के मंदिर में आना पड़ता है

सबसे पहले माता पाथरी का मंदिर सिंगा जाट ने बनवाया था और इनके परम भगत नथुराम थे माता पाथरी आषाढ़ में बुधवार को प्रकट हुई थी | माता पाथरी का इतिहास |

माता पाथरी की उत्पत्ति 

सोहन गुर्जर नाम का एक व्यक्ति था जो गोड बंगाल में रहता था उनके घर में माता का जन्म हुआ था माता के जन्म के बाद सोहन गुर्जर ने एक पंडित को माता के नामकरण के लिए अपने घर बुलाया जब वह पंडित माता के नामकरण के लिए आया तब माता जोर जोर से हंसने लगी थी इसके बाद माता का यह रूप देखकर वह पंडित बहुत डर गया और उसने कहा कि यह कोई ‘बला’ है,

इसे किसी मटके में बंद करके किसी कुएं में फेंक दो, यदि तुमने ऐसा नहीं किया तो तुम्हारे घर पर बहुत अधिक परेशानी आ सकती है इसके बाद पंडित की बातों को सुनकर सोहन गुर्जर भी डर गए और उन्होंने माता को मटके में बंद करके एक कुएं में फेंक दिया 1 दिन नागेबाबा भ्रमण करते हुए उस गांव में पहुंचे उनके दो सेवादार थे

नत्थू और फत्तू जो उनकी सेवा करते थे एक दिन नागेबाबा को प्यास लगती है और वह पानी पीने के लिए एक कुएं के निकट जाते हैं तभी कुएं में से एक बच्ची आवाज लगाती है कि कृपया मुझे कुएं से बाहर निकाल लीजिए नागेबाबा एक सिद्ध बाबा थे और उन्होंने उस बच्ची को पहचान लिया और उन्हें अपनी सिद्धि से बाहर निकाल लिया बाहर आने के बाद उस बच्ची ने माता का रूप धारण कर लिया था

इसके बाद नागेबाबा ने उस बच्ची को एक डिब्बी में बंद करके अपनी जटाओं में धारण कर लिया था नागेबाबा एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते रहते थे इसी प्रकार एक दिन नागेबाबा उस स्थान को छोड़कर जाने लगे तब नत्थू फत्तू बहुत ही उदास हुए और उन्होंने नागेबाबा से विनती की कि वह उन्हें छोड़कर कहीं ना जाए इसके बाद नागेबाबा उन्हें आशीर्वाद स्वरुप वह डिब्बी देकर वहां से चले जाते हैं

नागे बाबा के वहां से चले जाने के बाद नत्थू फत्तू उस डब्बी को खोलते हैं तब उस डिब्बी में से माता प्रकट होती है माता के इस रूप को देखकर वह बहुत अधिक डर जाते हैं और नत्थू फत्तू वहां से भाग जाते हैं जब भी नत्थू फत्तू उस स्थान पर आते थे तो माता उन्हें दर्शन देती थी परंतु है वह उन्हें पहचान नहीं पाते थे और डर कर वहां से भाग जाते थे

1 दिन गांव में बहुत अधिक महामारी फैल जाती है पशु-पक्षी और आदमी एक एक कर के मरने लगते हैं तभी गांव में एक चर्चा फैलती है कि नत्थू और फत्तू किसी अज्ञात शक्ति से बातचीत करते हैं जब गांव में पंचायत लगती है तब उस पंचायत में नत्थू और फत्तू को बुलाया जाता है और उन्हें उस पंचायत में धमकी दी जाती है कि गांव में यह महामारी का सिलसिला 2 दिन में नहीं रुका तो तुम्हें मौत के घाट उतार दिया जाएगा

उसी समय उस पंचायत में “सिंगा जाट” नाम का एक व्यक्ति आता है और वह उस बात का विरोध करता है कि किसी गरीब को कोई सजा मत दीजिए लेकिन जब गांव वाले उन्हें इस बात के बारे में बताते हैं कि यह दोनों किसी अज्ञात शक्ति से बातचीत करते हैं तो सिंगा जाट उनकी बातों पर विश्वास नहीं करता वह कहता हैं कि मैं किसी भी दिव्य शक्ति को नहीं मानता हूं

इसके बाद नत्थू और सत्तू माता के पास जाते हैं और उन से विनती करते हैं कि आप हमारी रक्षा कीजिए और गांव में जो महामारी फैली हुई है उसका निवारण कर दीजिए तभी माता पाथरी प्रकट होती हैं और नत्थू, फत्तू उनसे माफी मांगते हैं इसके बाद माता पाथरी उनसे कहती है कि मैं बलि के बदले बलि लूंगी, मैं हर दिन एक जानवर की बलि लिया करूंगी

तभी नत्थू माता पाथरी को बलि देने के लिए हां कर देता है इसके बाद गांव में मौत का सिलसिला रुक जाता है इसके बाद नत्थू, फत्तू जाकर सिंगा जाट को यह बात बताते हैं कि माता ने सब कुछ ठीक कर दिया है इसके बाद सिंगा जाट उन दोनों का मजाक उड़ाने लग जाते हैं जब वह हंस रहे थे तभी उनके शीश पर माता आ जाती है इसके बाद सिंगा जाट को यह विश्वास हो जाता है कि दिव्य शक्तियां भी होती है इसके बाद सिंगा जाट एक जाल के पेड़ के पास माता का स्थान बनवाते हैं और इसके बाद वहां निरंतर माता की पूजा होने लगती है | माता पाथरी का इतिहास |

नत्थू की बलि 

माता पाथरी को नत्थू हर रोज एक जानवर की भेंट दिया करते थे एक दिन उनके पास कोई भी जानवर नहीं बसता है और वह माता के पास आते हैं और उनसे कहते हैं कि अब आपको भेंट के रूप में देने के लिए मेरे पास केवल मेरा शीश है, क्योंकि अब मेरे पास कोई भी जानवर नहीं बचा है

इसके बाद माता पाथरी उनकी भक्ति को देखकर बहुत ही खुश होती है और वह नत्थू से कहती है कि मैं अब से हर रोज आपसे जानवर की भेंट नहीं लूंगी, केवल 6 महीने में एक बार जानवर की भेंट लूंगी क्योंकि तुमने अपनी भक्ति से मुझे प्रसन्न किया है जब तुम्हारे पास कुछ भी देने के लिए नहीं बचा तब भी तुम अपने शीश की भेंट देने के लिए आगे रहे | माता पाथरी का इतिहास |

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