History

 नाना साहेब पेशवा का इतिहास

 नाना साहेब पेशवा का इतिहास,नानासाहेब पेशवा का जन्म ,18 57 की क्रांति ,नानासाहेब पेशवा की मृत्यु ,नाना साहब का जीवन परिचय,पेशवा वंश के संस्थापक कौन थे,नाना साहब के नाम से कौन प्रसिद्ध 

नाना साहेब पेशवा का इतिहास

बालाजी बाजीराव पेशवा जिन्हें नाना साहेब के नाम से जाना जाता था जो मराठा साम्राज्य के प्रसिद्ध पेशवा थे इतिहास में अपने बहुमुखी व्यक्तित्व और समाज सुधारक कार्यों की वजह से जाने जाते थे सैन्य उपलब्धियों के अलावा उन्होंने बहुत तरीकों से मराठा साम्राज्य के ध्वज को देश के कोने-कोने में लहराने का काम किया है

बालाजी बाजीराव, बाजीराव प्रथम के जेष्ठ पुत्र थे जबकि बाजीराव प्रथम मराठा साम्राज्य के नौवें पेशवा थे और बालाजी बाजीराव की माता का नाम काशीबाई था नाना साहिब के भाई रघुनाथ राव ने मराठों के साथ विश्वासघात किया था और अंग्रेजों से हाथ मिला लिया जबकि जनार्दन की युवा अवस्था में ही मृत्यु हो गई नानासाहेब ने पारंपरिक शिक्षा ग्रहण की थी इस कारण उन्हें संस्कृत और धार्मिक ग्रंथों का ज्ञान था लेकिन उन्होंने अंग्रेजी और कोई भी अन्य पश्चिमी शिक्षा नहीं ली थी

नाना साहिब ने युद्ध कौशल और रणनीति की औपचारिक शिक्षा ली थी उनको घोड़ों और ऊंटों का बहुत शौक था साथ ही कई तरह के हथियार थे छत्रपति शाहू ने मराठा राज्य में 1749 में अपनी मृत्यु से पहले पेशवा का पद बनाया इस तरह मराठों में पेशवा शासन और उनके वंश के प्रभाविता शुरू हुई

आखरी पेशवा बाजीराव द्वितीय ने 7 जून 1827 के दिन नानासाहेब को गोद लेकर अपना उत्तराधिकारी घोषित किया जिसके बाद नानासाहेब ने 20 वर्षों तक अंग्रेजों के साथ संघर्ष करते हुए शासन किया इसके बाद अंग्रेजों ने नानासाहेब को उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया और साथ ही उनकी पेंशन भी बंद कर दी इसके बाद उन्होंने अंग्रेजों से युद्ध करने की सलाह बनाई  नाना साहेब पेशवा का इतिहास

नानासाहेब पेशवा का जन्म 

8 दिसंबर 1721 को बालाजी बाजीराव का जन्म हुआ उनका वास्तविक नाम “नानासाहेब” था अपने जन्म से ही बहादुर और वीर थे और अपने पिता के ही नक्शे कदम पर चलना चाहते थे उनके छोटे भाई रघुनाथ राव और जगन्नाथ राव थे जिनकी मृत्यु युवावस्था में हो गई थी

छत्रपति शिवाजी महाराज के शासन के बाद नाना साहेब सबसे प्रभावशाली शासकों में से  एक थे जिन्हें “बालाजी बाजीराव” के नाम से भी जाना जाता था 1749 में जब छत्रपति शाहू की मृत्यु हुई तब उन्हें मराठा साम्राज्य का पेशवा बनाया गया 23 साल की अल्पायु में ही बालाजी बाजीराव के कंधों पर मराठा साम्राज्य का भार आ चुका था

नाना साहेब ने भी इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया था उनके शासनकाल में मराठा साम्राज्य पेशावर जो कि वर्तमान में पाकिस्तान है वहां तक जा पहुंचा था 20 सालों तक नाना साहेब ने मराठा साम्राज्य पर शासन किया नानासाहेब एक महत्वकांक्षी शासक थे और बहुमुखी व्यक्तित्व के धनी थे 1741 में उनके चाचा हिमांशी की मृत्यु हो गई और परिणाम स्वरुप उत्तरी जिले से लौटकर उन्होंने कुछ साल पुणे के नागरिक प्रशासन को सुधारने में व्यतीत किए  1741 से 1745 तक के समय को शांति काल के नाम से जाना जाता था

उन्होंने पुणे जाकर कृषि को बढ़ावा दिया गांव वालों को सुरक्षा दी और राज्य में कई सुधार किए पुणे शहर के विकास में मराठा साम्राज्य के शासकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है उनके साम्राज्य में उन्होंने पुणे को एक विशालकाय शहर में परिवर्तित कर दिया उन्होंने पुणे में मंदिर और विशालकाय पुलों का निर्माण किया और पूरे शहर का रूप बदल दिया

साथ ही पुणे कात्रज में उन्होंने पानी के तालाबों का भी निर्माण करवाया इसके बाद 1761में पानीपत के तीसरे युद्ध तक उनके नेतृत्व में मराठा साम्राज्य अपने शीर्ष बिंदु तक पहुंच चुका था लेकिन निर्णय आत्मक युद्ध में मराठों की हार ने पूरे देश पर शासन करने के सपने को चकनाचूर कर दिया था  नाना साहेब पेशवा का इतिहास

1857 की क्रांति 

जब अंग्रेजों ने नानासाहेब को उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया तब 4 जून 1857 को कानपुर में सैन्य विद्रोह हुआ कानपुर को अंग्रेजों से जीतने के बाद नाना साहिब ने अपने आपको कानपुर का पेशवा घोषित कर दिया इसके बाद नानासाहेब ने कानपुर के कलेक्टर को अपने विश्वास में लिया और यह योजना बनाई की यदि कानपुर में फिर से सैन्य विद्रोह होता है तो वह 15000 सैनिकों की उनको मदद देंगे लेकिन नाना साहिब ने कुशल कूटनीति का परिचय देते हुए न केवल अंग्रेजों से युद्ध किया बल्कि कानपुर पर कब्जा कर लिया

इसी दौरान “सती चौरा घाट कांड” भी हुआ जिसमें बहुत से अंग्रेज महिला और बच्चे मारे गए इसे अंग्रेजों ने नाना साहेब का विश्वासघात माना इसके बाद बचे हुए अंग्रेजों को नाना साहिब ने  एक हुसैनी खानों की निगरानी में रखा जहां पर खानी और स्वच्छता की कमी चलते और कुछ अंग्रेज महिलाएं और बच्चे मारे गए जबकि कुछ को एक अनजान आदेश के कारण मार दिया गया इस तरह नाना साहिब के नेतृत्व में 1857 की क्रांति के दौरान कानपुर में अंग्रेजों को बंदी बनाकर रखना क्रांतिकारियों का अंग्रेजो के खिलाफ लिया गया

यह बड़ा सफल रहा नाना साहिब की यह सफलता ज्यादा दिन नहीं रही नाना साहिब भाई बाला राव ने भी अंग्रेजों से ‘ओम’ का युद्ध किया जिसमें उनकी हार हो गई और ऐसे कई छोटे-बड़े युद्ध के बाद आखिर में 16 मई 1857 को जनरल हैवलॉक ने कानपुर को वापस अपने कब्जे में ले लिया नाना साहेब के बचपन के साथी तात्या टोपे और रानी लक्ष्मीबाई पर भी स्नेह था इसी कारण झांसी की समस्या को सुलझाने में नाना साहिब ले लक्ष्मी बाई की मदद की थी  नाना साहेब पेशवा का इतिहास

नानासाहेब पेशवा की मृत्यु 

1761 में पानीपत के तीसरे युद्ध में बालाजी बाजीराव पेशवा ने अपने बेटे विश्वास राव को खो दिया और उसके कुछ समय बाद ही 23 जून 1761 में उनकी मृत्यु हो गई इनकी मृत्यु के बाद इनका दूसरा पुत्र माधवराव पेशवा उत्तराधिकारी बना है  

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