History

पंडित नारायण राव व्यास का इतिहास

पंडित नारायण राव व्यास का इतिहास, नारायण व्यास यांचे जन्मगाव, पंडित नारायण राव की उपाधि, पंडित नारायण व्यास की मृत्यु 

पंडित नारायण व्यास का जन्म 

पंडित नारायण व्यास का जन्म कोल्हापुर में 4 अप्रैल सन 1902 को हुआ था इनके वंशीधर पौराणिक शास्त्री थे इनके पिता संगीत शास्त्र के अच्छे ज्ञाता थे और सितार के विशेष प्रेमी थे जब यह 8 वर्ष के थे तब इनकी इच्छा गायन सीखने की हुई संगीत के प्रति रुचि ,मधुर व दोष रहित आवाज इत्यादि गुण भाग्यशाली व्यक्ति में ही पाए जाते हैं पंडित नारायण व्यास जी अभ्यास करने लगे यह पद और गीत को इतनी सुंदरता से गाते थे कि श्रोता सुनने के बाद हैरान रह जाते थे और कहते कि यह बालक 1 दिन बहुत बड़ी सफलता प्राप्त करेगा

इनकी प्रतिभा को देखकर एक नाटक कंपनी ने इन्हें नौकरी देने का प्रस्ताव रखा परंतु इन्होंने वह नौकरी करने से मना कर दिया क्योंकि उन दिनों ऊंचे घराने के  युवकों  के लिए नाटक कंपनी में काम करना अपमान जनक समझा जाता था जब इन्होंने संगीत शिक्षा प्राप्त करने का निश्चय किया तो इनके अभिभावक आनाकानी करते रहे उस समय कोल्हापुर में केवल मुसलमान ही इस कला की शिक्षा दिया करते थे इसके बाद 1910 में पंडित विष्णु दिशंकर कोल्हापुर आए वहां उन्होंने अपनी कला का प्रदर्शन किया उस प्रदर्शन में नारायण राव भी सम्मिलित हुए पंडित जी के साथ कुछ कम उम्र के शिष्य भी थे जो नियम पूर्वक गाया करते थे

उनका शिष्यों के प्रति अपार प्रेम और शिक्षा देने का सरल ढंग देखकर व्यास जी के संरक्षक ने दोनों बालकों ,पंडित नारायण राव व्यास और उनके बड़े भाई शंकर राव व्यास को उनके पास भेजने का निश्चय किया इसके बाद इन दोनों भाइयों ने अपनी शिक्षा विष्णु दीशंकर के पास से ग्रहण की इसके बाद 1910-13 मे शंकरराव व्यास और नारायण राव व्यास गांधर्व महाविद्यालय में प्रविष्ट करा दिए गए 9 वर्ष तक  दीशंकर ने इन्हें शिक्षा दी थी

इसके बाद सन् 1921 में दोनों भाइयों ने सफलता पूर्वक अध्ययन समाप्त करके संगीत -प्रवीण की उपाधि प्राप्त की थी तथा  ‘जॉर्ज लायड’ के  कर कमलो द्वारा स्वर्ण पदक प्राप्त किए इसके बाद 1923 में दोनों भाइयों ने “अहमदाबाद” में संगीत विद्यालय खोला ताकि भारतीय नवयुवक संगीत कला का ज्ञान प्राप्त कर सके इस विद्यालय में नारायणराव व्यास जी ने लगभग 4 साल तक कार्य किया 

पंडित नारायण राव की उपाधि

 इसके बाद 1927 में नारायणराव व्यास मुंबई आ गई यह समझ कर कि मुंबई एक व्यापारिक केंद्र है यहां पर संगीत कला का प्रदर्शन सफलतापूर्वक किया जा सकता है 1927 में “हिज मास्टर वॉइस” कंपनी ने इनके गायन के रिकॉर्ड बनाए जो बहुत लोकप्रिय हुए इनको विभिन्न संस्थाओं और विश्वविद्यालयों द्वारा अनेक प्रशक्ति पत्र तथा उपाधियों से विभूषित किया गया 1921 में इनको गंधर्व महाविद्यालय से संगीत प्रवीण, व गायनाचार्य, सिंध प्रांत से ‘संगीत रतन’, पंजाब से तान के कप्तान, भारतीय गंधर्व महाविद्यालय मंडल से ‘संगीत महाउपाध्याय’ इन म्यूजिक की उपाधि मिली थी 

पंडित नारायण व्यास की मृत्यु 

यह विष्णु शंकर जी के विशेष शिष्यों में रहे और अंत समय तक उनकी सेवा करते रहे पंडित नारायण राव ने संगीत विषय पर कई पुस्तकें भी लिखी इनके बड़े भाई शंकरराव व्यास भी उच्च कोटि के संगीतकार थे दोनों भाइयों ने मिलकर 1937 में मुंबई में व्यास संगीत विद्यालय की स्थापना की थी 1 अप्रैल सन 1984 को मुंबई में पंडित नारायण राव व्यास का निधन हो गया वर्तमान समय में इनके पुत्र डॉक्टर विद्याधर व्यास संगीत के शैक्षणिक कार्यों में लगे हुए हैं और ग्वालियर घराने के अग्रणी गायकों में गिने जाते हैं 

पंडित नारायण राव व्यास का इतिहास 

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