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श्रील प्रभुपाद का जीवन परिचय

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श्रील प्रभुपाद का जन्म 

श्रील प्रभुपाद का जन्म 1 सितंबर 1896 में भारत के कोलकाता में हुआ था इनके पिता जी का नाम ‘गौर मोहन’ और इनकी माता जी का नाम ‘रजनी’ था इनके बचपन का नाम अभय चरण था जब यह 14 वर्ष के थे तब इनकी माता का स्वर्गवास हो गया था सन 1922 में इन्होंने पहली बार कोलकाता में अपने गुरु शिल्प सिद्धांत सरस्वती गोस्वामी से मुलाकात की थी

इनके गुरु भक्ति विद्वान थे वह 64 मठों की शाखाओं के संस्थापक थे इनको श्रील प्रभुपाद बहुत ही पसंद आए और उन्होंने निश्चय किया कि वह इन्हें शिक्षा देंगे  इसके बाद श्रील प्रभुपाद सरस्वती गोस्वामी की शिक्षा से बहुत ही प्रभावित हुए और उन्होंने 11 साल बाद सन 1933 में इलाहाबाद में औपचारिक रूप से उनके दीक्षित शिष्य बन गए अपनी पहली बैठक में सरस्वती गोस्वामी ने श्रील प्रभुपाद को अंग्रेजी भाषा में वैदिक ज्ञान का प्रचार करने का अनुरोध किया था

बाद के वर्षों में श्रील प्रभुपाद ने श्रीमद भगवत गीता पर एक टिप्पणी लिखी थी इसके बाद श्रील प्रभुपाद ने बिना किसी सहायता के 1944 में अंग्रेजी में एक पत्रिका बैक टू गोडेड की शुरुआत की थी इसके बाद श्रील प्रभुपाद के दार्शनिक ज्ञान और भक्ति को पहचानते हुए “गोडिय वैष्णो सोसाइटी” ने उन्हें भक्ति वेदांत की उपाधि से विभूषित किया था | श्रील प्रभुपाद का जीवन परिचय |

श्रीमद भगवत गीता का अंग्रेजी में अनुवाद

 1950 में 54 वर्ष की आयु में श्रील प्रभुपाद विवाहित जीवन से निवृत्त हुए थे 4 साल बाद उन्होंने “वानप्रस्थाश्रम” को अपनाने के बाद अधिक से अधिक समय अध्ययन और लेखन में लगाया कुछ समय बाद श्रील प्रभुपाद  वृंदावन गए जहां पर बहुत ही विषम परिस्थितियों में रहे थे वहां पर उन्होंने अपने लेखन और अध्ययन में अधिक से अधिक समय लगाया था

इसके बाद उन्होंने 1959 में जीवन के उच्चतम आश्रम सन्यास को  स्वीकार कर लिया था वृंदावन में ‘राधा दामोदर मंदिर’ में श्रील प्रभुपाद ने अपने जीवन की उत्कृष्ट कृति पर भी काम करना शुरू कर दिया था उन्होंने 18000 श्लोक वाली श्रीमद भगवत गीता का अंग्रेजी अनुवाद और एक पुस्तिका, अन्य ग्रहों के लिए सरल यात्रा भी लिखी थी 

अमेरिका की यात्रा

 श्रीमद्भागवत गीता के तीन खंड प्रकाशित करने के बाद श्रील प्रभुपाद ने आध्यात्मिक मिशन को पूरा करने के लिए 1965 में संयुक्त राज्य अमेरिका गए थे 69 वर्ष की आयु में जब वह 37 दिनों की कठिन यात्रा के बाद अमेरिका पहुंचे तो उन्हें यह नहीं मालूम था कि उन्हें कहां जाना है यात्रा के दौरान श्री प्रभुपाद को 2 हाथ अटैक आ चुके थे परंतु फिर भी कृष्ण भक्ति के प्रचार का निश्चय दृढ़ बना रहा उन्होंने अपनी डायरी में लिखा था कि हे कृष्ण मुझे नहीं पता कि आपके मन में क्या है बौद्धिकता से ग्रस्त है

यहां के लोग मुझे सुनेंगे या नहीं मैं नहीं जानता परंतु यह विश्वास है कि आपने मुझे यहां पर भेजा है तो इसमें आपकी कोई ना कोई योजना जरूर होगी और मैं एक कठपुतली की तरह आपके हर उद्देश्य को पूरा करने के लिए तैयार हूं अमेरिका में श्रील प्रभुपाद ने अपने 10हजार शिष्य बनाए थे और उन्हें अलग-अलग देशों में शिक्षा का प्रचार करने के लिए भेजा था

उन्होंने अपने शिष्य पाकिस्तान तक भेजे थे इन्होंने अपने शिष्यों से कहा कि तुम्हें भागवत गीता को पूरी दुनिया में पहुंचाना है पाकिस्तान में इन्होंने 12 मंदिरों का निर्माण करवाया था तब से लेकर वह अपने जीवन के अंत तक भारत के दार्शनिक ग्रंथों पर 60 से अधिक प्रमाणिक ग्रंथ, टिप्पणियां और सारांश अध्ययन लिख चुके थे लगभग 1 वर्ष बाद बड़ी ही कठिनाई से उन्होंने जुलाई सन 1966 में “अंतर्राष्ट्रीय कृष्ण भावना मृत सोसाइटी” की स्थापना की थी | श्रील प्रभुपाद का जीवन परिचय |

इस्कॉन मंदिर की स्थापना 

अपने सावधानी मार्गदर्शन के तहत यह सोसाइटी अपने दशक में 108 मंदिरों,आश्रमों, स्कूलो  विश्वव्यापी संग्रह समुदायों में विस्तारित हुई श्रील प्रभुपाद ने भारत के पश्चिम बंगाल के सीधा मायापुर में एक बड़े अंतरराष्ट्रीय केंद्र (इस्कॉन मंदिर) के निर्माण को वितरित किया जो वैदिक अध्ययन के लिए एक उत्तम स्थान है श्रील प्रभुपाद का सबसे बड़ा योगदान उनकी पुस्तकें हैं  अकादमी समुदायों द्वारा उनकी प्रमाणिकता,  गहराई और स्पष्टता के लिए अत्यधिक सम्मानित कर

इन्हें कई कॉलेजों में मानक पुस्तकों के रूप में उपयोग किया जाता है उनके लेखन को 80 भाषाओं में अनुवाद किया गया है भक्तिवेदांता बुक ट्रस्ट  जिसे 1972 में स्थापित किया गया था जो विशेष रूप से उनके लेखन कार्यों को प्रकाशित करने के लिए बनाया गया है इस प्रकार भारतीय धर्म और दर्शन के क्षेत्र में पुस्तकों के लिए दुनिया का सबसे बड़ा प्रकाशक बन चुका है यह बुक ट्रस्ट अब तक 5 करोड़ से अधिक भगवत गीता का मुद्रण और वितरण कर चुका है अपने

श्रील प्रभुपाद की मृत्यु 

14 नवंबर 1977 को श्रील प्रभुपाद की मृत्यु हो गई थी जीवन के आखिरी 10 वर्षों में वृद्धावस्था के बावजूद श्रील प्रभुपाद  ने पूरे विश्व की 14 बार यात्रा की थी अपने अंतिम समय तक श्रील प्रभुपाद ने लिखना जारी रखा था उनकी पुस्तकें वैदिक दर्शन, धर्म, साहित्य और संस्कृति के एक वास्तविक पुस्तकालय का गठन करती है वह अपने पीछे वैदिक दर्शन और संस्कृति का एक वास्तविक पुस्तकालय छोड़कर गए हैं 1966 से 1977 के बीच उन्होंने दुनिया भर में यात्रा की,विश्व के नेताओं से मुलाकात की,वैदिक दर्शन को समझने के लिए लोगों को ज्ञान प्रदान किया संसार में कोई ऐसा पुरुष आता है जो सामान्य व्यक्ति की सोच और शक्ति से अधिक कार्य करके जाता है और उन्हीं में से एक थे श्रील प्रभुपाद | श्रील प्रभुपाद का जीवन परिचय |

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