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संत चरण दास जी का जीवन परिचय

संत चरण दास जी का जीवन परिचय, संत चरण दास जी का जन्म, चरण दास जी की शिक्षा, संत चरण दास जी के गुरु, चरण दास जी की पौराणिक कथा,चरण दास जी की मृत्यु 

संत चरण दास जी का जन्म

 चरण दास जी का जन्म 250 राजस्थान के अलवर जिले के डेहरा गांव में हुआ था इनके पिता जी का नाम मुरलीधर था वह बहुत ही शांत स्वभाव के थे ग्रस्थ होने पर भी सभी लोग उन्हें साधु ही कहते थे इनकी माता जी का नाम कुंती देवी था वह बहुत ही निर्मल स्वभाव की थी चरणदास के माता पिता का उनके गांव में ही नहीं बल्कि आसपास के गांवों में भी उनका बहुत ही सत्कार हुआ करता था लोग उन्हें बहुत ही स्नेह और सम्मान देते थे चरणदास के माता-पिता के अंदर परोपकार का भाव था और सद सेवा की भावना थी जब चरणदास जी 5 वर्ष के हुए तब इनके अंदर राम नाम की बहुत ही लगन थी यह राम नाम जपते रहते थे और लिखते रहते थे यह अपने पास कई बच्चों को बिठाकर के राम नाम का कीर्तन करते थे | संत चरण दास जी का जीवन परिचय |

 चरण दास जी की शिक्षा

  कुछ लोगों ने इनके माता-पिता से कहा कि आप अपने बेटे को पढ़ने के लिए भेजिए यह तो सारा दिन राम नाम में ही लगा रहता है इसके बाद चरणदास जी को स्कूल में भेजा गया परंतु पढ़ाई में इनका बिल्कुल भी मन नहीं लगता था इनके अध्यापक ने इन्हें पढ़ाने के लिए बहुत ही हट किया फिर इन्होंने अध्यापक से कहा यह सारी तो लौकिक विद्या है इस लौकिक विद्या से जीव का कल्याण नहीं हो सकता इसके बाद इन्होंने कहा कि मुझे तो भगवान की भक्ति पढ़नी है

आप बच्चों को राम नाम क्यों नहीं पढ़ाते हो यदि तुम अपना भी कल्याण चाहते हो तो राम की भक्ति पढ़ो और हमें भी वही पढ़ाओ हमें भगवान के नाम की शक्ति पढ़ाओ इसके बाद चरण दास जी की बातों का अध्यापक पर बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ा और वह भी अध्यात्मिक बन गए इसके बाद वह अध्यापक इनके माता-पिता के पास गए और उनसे जाकर यह निवेदन किया कि आपका बच्चा कोई संत है यह केवल भक्ति ही करेगा पढ़ेगा नहीं 

संत चरण दास जी के गुरु 

 जब चरणदास जी अपने घर में ही थे, तब उनके मन में यह विचार हो गया था कि मुझे केवल सुखदेव से ही शिक्षा ग्रहण करनी है इसके बाद वह सुखदेव से दीक्षा ग्रहण करने के लिए घर से निकल पड़े उस समय वहां पर एक ब्राह्मण सिपाही था जो कि चरण दास जी की बहुत ही निंदा किया करता था 1 दिन चरण दास जी ने ब्राह्मण सिपाही को अपनी कुटिया में बुलाया और उसे बहुत से व्यंजन बनाकर भोजन कराया और उससे कहा कि जब तुम हर रोज मेरी निंदा करते हो तो उससे मेरे सभी पाप धुल जाते हैं और मुझे शिक्षा मिलती है

इसके बाद चरण दास जी ने उस सिपाही को ₹5 दक्षिणा में दिए इसके बाद उस सिपाही में ऐसा परिवर्तन हुआ कि वह चरण दास जी के चरणों में गिर के रोकर माफी मांगने लगा और फिर उनका शिष्य बन गया इसके बाद वह अपना घर छोड़कर दिल्ली में आकर रहने लगा इसके बाद इन्होंने एक पहाड़ में गुफा तलाश कर ली थी और उसी गुफा में 14 वर्ष तक तप किया था जब भक्तों की भीड़ इन्हें अधिक घेरने लग गई तब यह 1 वर्ष अज्ञातवास में भी रहे थे चरणदास जी कामवासना से बचने का संदेश अपने शिष्यों को दिया करते थे चरणदास जी दिल्ली में रहकर लोगों को जगह-जगह जाकर शिक्षा दिया करते थे उनके विचारों का लोगों पर इतना प्रभाव पड़ा कि वह भी श्रीकृष्ण की भक्ति में लग गए | संत चरण दास जी का जीवन परिचय |

चरण दास जी द्वारा कस्बे की स्थापना 

दिल्ली में चरण दास जी ने अपने गुरु सुखदेव नाम का एक कस्बा भी बनाया था बाद में उस कस्बे का नाम चरण दास जी रखा गया और आज वर्तमान समय में उसे “चांदनी चौक” से जाना जाता है उस कस्बे में चरण दास जी  का आश्रम भी बना हुआ है चरणदास जी ने भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति के लिए कुछ ग्रंथ भी लिखे जैसे -माखन चोरी की लीला, कालिया नाग पर की गई लीला आदि का वर्णन था इन्होंने कुछ ऐसे ग्रंथ भी लिखें जिसमें कृष्ण और राधा के सरस लीलाओं का वर्णन है इन्होंने अपने मन को बिल्कुल ही संसार से हटा लिया था

इन्होंने वैराग्य का एक ऐसा आंदोलन चलाया जिसमें कुछ माताएं भी इनके पास आकर विरक्त हो गई जिसमें सहजोबाई और दया बाई का नाम बड़े ही आदर से लिया जाता है चरणदास जी अपने गुरु सुखदेव की महिमा को बहुत ही गाते थे और यह बताते थे कि मेरे गुरु सुखदेव के कारण ही हमें भगवान की भक्ति प्राप्त होती है चरणदास जी एक बहुत ही महान पुरुष थे जिन पर सुखदेव जैसे परमहंस गुरु ने कृपा की थी चरण दास जी ने जीवन भर परोपकार और तपस्या कि उनकी तपस्या इतनी महान थी कि राजा लोग भी दौड़ कर उनके पास आते थे और इनका दर्शन करने के बाद ही अपने राज्य का कार्य शुरू करते थे

लोगों में चरण दास जी के प्रति बहुत ही भाव था चरणदास जी इतने महान पुरुष थे कि भगवान  प्रत्यक्ष रूप से इनके कार्य में सहयोग करते थे परंतु भगवान और लोगों को दिखाई नहीं देते थे केवल चरणदास जी को ही ऐसा महसूस होता था कि भगवान श्रीराम उनके साथ हैं इनके साथ कभी राम रूप में तो कभी कृष्ण रूप में ठाकुर जी की लीला हुआ करती थी उन्हीं लीलाओं का अनुभव करके इनके शिष्य मगन रहा करते थे कि हमारे गुरुदेव के साथ भगवान खेलते हैं चरण दास जी ने सुखताल नामक स्थान पर दीक्षा ग्रहण की थी चरण दास जी ने मुख्य कर्म क्षेत्र दिल्ली को बनाया था वैसे तो वह लखनऊ, मेरठ, मुजफ्फरनगर कई स्थानों पर गए थे 250वर्ष पहले दिल्ली में चरणदास जी के शिष्य सहजोबाई और दया बाई के भजन गाए जाते थे चरण दास जी की स्मृति में बहुत से ग्रंथ लिखे गए हैं 

चरण दास जी की पौराणिक कथा 

दक्षिण भारत में श्रीनाथ मुनि नाम के एक संत हुए वह भगवान सीताराम जी के महान भक्त थे वह जब भी रामायण पढ़ते हैं सुनते थे तो सीता का वियोग, परित्याग उनसे सहन नहीं होता था और वह महीनों तक रोते रहते थे रामायण में सीता के प्रति जो राम का वियोग होता था वह उनसे सहन नहीं होता था और वह उस वियोग से इतनी दुखी हो जाते थे कि वह खाना पीना भी छोड़ देते थे 1 दिन  वह श्री रंगनाथ जी के चरणों में गिरे रंग धाम जाकर तो  भगवान श्री रंगनाथ जी ने उनके सिर पर हाथ रखा और उनसे कहा कि उठो बेटा और दर्शन करो

मेरा इसके बाद श्रीनाथ मुनि ने उनके दर्शन किए परंतु उनका रोना बंद नहीं हुआ इसके बाद श्री रंगनाथ जी ने उनसे पूछा कि आप क्यों रो रहे हो इसके बाद उस मुनि ने उनसे पूछा कि क्या आपने राम रूप में कोई ऐसा जन्म नहीं लिया जिसमें सीता का वियोग हुआ हो इसके बाद रंगनाथ जी ने कहा मैंने ऐसा अवतार लिया है जिसमें सीता का वियोग नहीं हुआ परंतु लोगों को पता नहीं है इसके बाद नाथ मुनि ने उनसे कहा कि मैं उस अवतार के बारे में जानना चाहता हूं इसके बाद मंदिर के द्वार अपने आप बंद हो गए और उनके हाथ में एक दिव्य लेखनी चमकने लगी

इसके बाद ठाकुर जी बोलते गए और नाथ मुनि जी उस लेखनी से ताड़ के पत्ते पर लिखते गए उस समय उनके अंदर देवी शक्ति प्रकट हो गई थी और उन्होंने पूरी रामायण लिख दी उस समय उस रामायण का नाम हुआ श्रीनाथ रामायण वह रामायण आज भी श्री रंगनाथ मंदिर में रखी हुई है उस ग्रंथ को वहां के लोग बाहर नहीं निकाले देते और ना ही उसकी कॉपी करने देते हैं उनका मानना है कि उत्तर भारत में जो तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस चल रही है लोग उस के पन्नों को फाड़कर दुकानों पर बेच रहे हैं,

उसके पन्नों मे मिर्च मसाले डालकर दिए जाते हैं इस प्रकार रामायण की दुर्दशा होती है इसलिए हम लोग इस ग्रंथ को बाहर नहीं निकलने देंगे जो व्यक्ति दक्षिण भाषा को जानता है वह वही जाकर उस ग्रंथ को सुनता है वह ग्रंथ बाहर उपलब्ध नहीं है रामायण में सीता का वियोग नहीं हुआ है और राम का संपूर्ण जीवन आनंद में दर्शाया गया है उस ग्रंथ में वियोग की बात कहीं पर भी नहीं है 

चरण दास जी की मृत्यु 

सन 1782 ई. में चरण दास जी समाधिस्थ हुए आज भी जामा मस्जिद के पास इनका अखाड़ा इनके बताए अनुशासन के अनुसार सक्रिय है 79 वर्ष की अवस्था में इन्होंने अपने शरीर को त्याग दिया था संत चरणदास जी कृष्ण भक्ति की सशक्त डोर लिए जीवन के लक्ष्य साधन हेतु अष्टांग योग की साधना का प्रचार किया था 

| संत चरण दास जी का जीवन परिचय |

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